मैट्रिक पास कर इतिहास रचने वाली बेटी आम बेचने पर मजबूर,सरकार की बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना कटघरे में!

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दरभंगा । जिला मुख्यालय से महज 3 किलोमीटर दूर स्थित गोसलाबर गांव पिछले दिनों अखबारों की सुर्खियों में था। कलमकारों अपने कोष के चुनिंदा शब्दों को क्रमबद्ध कर गांव की उन बालिकाओं के लिए कसीदे गढ़ रहे थे। जिन्होंने आजादी के 70 साल बाद मैट्रिक पास कर अपने गांव पर अशिक्षित होने का लगा बदनुमा दाग धोया था।उस दिन गांव में जश्न का माहौल था, मजदूर माता पिता को पूरा गांव बधाई दे रहा था, मिठाईयां बँट रही थी।लेकिन आज तब आंखें नम हो गई जब इन बच्चियों में से मैट्रिक उत्तीर्ण कर गांव का इतिहास रचने वाली एक बच्ची बहेड़ी – दरभंगा मुख्य सड़क पर आम बेचती नजर आई। आखिर यह किसका दोष है। उस गरीब मां-बाप का जो तंगी से जूझ रहे हैं,या फिर उस सरकार का जो बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा देकर खुद अपनी पीठ थपथपा रही है।या फिर उस जिला प्रशासन का जिसका शिक्षा का अलख जगाने के नारे चारों ओर चस्पा नजर आते हैं। बहादुरपुर प्रखंड मुख्यालय के गृह पंचायत बहादुरपुर देकुली के वार्ड संख्या 10 के गोसलावर गांव की इस बदकिस्मत बच्ची का नाम कविता है।पिछले वर्ष गांव की ही नेहा कुमारी और पूजा कुमारी ने मैट्रिक पास कर गांव का नाम रोशन किया था।पिछले मर्तबा कविता महज कुछ अंको से चुक कर गई थी।लेकिन इस बार उसने जोर लगाया और आखिरकार सफलता पा ही ली। यह उस गांव के लिए लगातार दूसरे वर्ष खुशियों की सौगात लेकर आया था।जहां आज भी ना तो एक विद्यालय है और ना ही कोई सामुदायिक केंद्र। यहां तक कि ना तो कोई आंगनवाड़ी केंद्र है और ना ही स्वास्थ्य सेवा की सबसे छोटी इकाई स्वास्थ्य केंद्र। गांव को मुख्यालय से जोड़ने वाले सड़क का भी सर्वथा अभाव रहा है। ऐसे गांव में कविता का मैट्रिक पास करना किसी आसमानी सितारे को तोड़ने से कम नहीं था। लेकिन आज जब तपती दोपहरी में पसीने से तरबतर कविता ने अपने दर्द को बयां किया तो ऐसा लगा मानो सरकार अथवा प्रशासन नाम की कोई चीज नहीं है।शिक्षा व्यवस्था का केवल ढिंढोरा पीटा जाता है। वास्तविकता कहीं अलग है। मासूम सी उस बच्ची ने बेहद मासूमियत से बताया सड़क किनारे टोकरी लगाकर बैठना मजबूरी है। माता पिता इतने सक्षम नहीं हैं कि हम भाई-बहनों को 2 जून की रोटी खिला सके। सब मिलकर काम करेंगे तभी चूल्हा जलेगा। मैट्रिक जब पास किया था तब अखबार वाले आए थे। स्कूल के शिक्षकों ने शाबाशी दी थी।लेकिन अब कोई नहीं आता। कहीं से मदद भी नहीं मिलती। हम कैसे अपने सपनों को पूरा करेंगे।

रिपोर्ट :- संजय कुमार

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