पुण्‍यतिथि विशेष: इंदिरा गांधी के करीबी इस रेलमंत्री का मर्डर बन गया मिस्ट्री, 40 साल कोर्ट में चला केस..No. 1 web news portal

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पटना,न्यूज ऑफ मिथिला । 3 जनवरी 1975 के उस मनहूस दिन पूरा देश हिल गया था। इसी दिन भारतीय राजनीति में एक कद्दावर नेता व तत्‍कालीन रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र की मौत हुईथी। एक दिन पहले बिहार के समस्‍तीपुर स्‍टेशन पर उन्‍हें बम मारकर बुरी तरह घायल कर दिया था।
घटना के अगले दिन दानापुर रेलवे स्‍टेशन पर उनकी मौत हो गई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस हत्याकांड को विदेशी साजिश का हिस्सा बताया था। इस कांड में 40 साल बाद जिन्‍हें कोर्ट ने सजा दी, उन्‍हें ललित बाबू के परिजन निर्दोष मानते हैं। अब उनके बेटे इस हत्याकांड की फिर से जांच कराने की मांग पर अड़े हैं।
साफ-सुथरी छवि के कद्दावर नेता थे ललित बाबू
ललित नारायण मिश्र साफ छवि वाले कद्दावर नेता थे। इस कारण वे कई लोगों की आंखों की किरकिरी बन गए थे। उनकी हत्‍या पर कोर्ट के फैसले के बावजूद इसमें बहुत कुछ ऐसा है, जिसपर आज तक धूल पड़ी हुई है। ललित नारायण मिश्र के पुत्र और बिहार विधान परिषद के सदस्य विजय कुमार मिश्र मानते हैं कि इस हत्याकांड की फिर से जांच होनी चाहिए।

1973 से 1975 तक रहे भारत के रेल मंत्री
बिहार के सहरसा (अब सुपौल) के निवासी ललित नारायण मिश्र 1973 से 1975 में हत्‍या तक भारत के रेल मंत्री रहे थे। वे तीन बार लोकसभा के सदस्य निर्वाचित हुए थे। वे राज्यसभा के भी सदस्य रहे। साल 1973 में रेलमंत्री बनने के पहले वे पार्टी और सरकार के कई महत्‍वपूर्ण पदों पर रहे।

खास बात यह कि ललित नारायण मिश्र ने दस दौर में ही मनमोहन सिंह की प्रतिभा को पहचान लिया था। विदेश व्यापार मंत्रालय का काम देखते हुए उन्होंने मनमोहन सिंह को विदेश व्यापार मंत्रालय में सलाहकार नियुक्त किया था।

समस्‍तीपुर में बम मारकर कर दी गई थी हत्‍या
दो जनवरी 1975 को रेलमंत्री के रूप में ललित नारायण मिश्र बिहार के दौरे पर समस्तीपुर में ब्रॉडगेज लाइन का उद्घाटन करने गए थे। इस दौरान वहां बम विस्फोट में वे गंभीर रूप से घायल हो गये। इलाज के लिए दानापुर के अस्पताल ले जाने के दौरान अगले दिन तीन जनवरी को उनकी मौत हो गई थी। हत्या की यह गुत्थी आज तक अनसुलझी है।

जांच प्रक्रिया में कई पेंच, कई गुत्‍थियां अनसुलझीं
इस हाई-प्राफाइल हत्याकांड की जांच की प्रक्रिया में कई पेंच हैं। इसकी जांच और सुनवाई में रिकाॅर्ड समय लगा। साथ ही कई गुत्थियां अनसुलझी रह गईं।

दिल्‍ली के किसी बड़े नेता की साजिश का बयान
अनुसंधान के शुरूआती दौर में बिहार पुलिस की सीआइडी ने अरुण कुमार ठाकुर और अरुण मिश्र के सनसनीखेज बयान कोर्ट में दर्ज कराए थे। उन्‍होंने समस्तीपुर में कोर्ट में बयान दिया था कि किसी प्रभावशाली व्यक्ति के कहने पर उन्‍होंने हत्या की योजना बनाई थी। बयानों से यह बात सामने आई थी कि हत्याकांड में बिहार के एक विधान पार्षद सहित दिल्ली के एक चर्चित नेता भी शमिल थे।

लेकिन बाद में सीबीआइ ने उक्‍त दोनों इकबालिया बयानों को खारिज करते हुए उन्‍हें निर्दोष बता दिया। इससे यह गुत्‍थी अनसुलझी रह गई कि हत्‍या की साजिश में शामिल ‘प्रभावशाली’ व्‍यक्ति कौन था।

घंटों विलंब से चली घायल ललित बाबू अस्‍पताल ले जाती ट्रेन
ललित नारायण मिश्र के बम विस्‍फोट में घायल होने के बाद उनके इलाज में भी लापरवाही दिखी। दानापुर अस्‍पताल ले जाने में अनावश्‍यक विलंब हुआ। हत्याकांड की जांच के लिए बनाए गए मैथ्यू आयोग के समक्ष समस्तीपुर रेल पुलिस अधीक्षक सरयुग राय और अतिरिक्त जिलाधिकारी आरवी शुक्ल ने खुलासा किया था कि ललित नारायण मिश्र को समस्तीपुर से दानापुर ले जाने वाली गाड़ी समस्तीपुर स्टेशन पर शंटिंग में ही 1.10 घंटा खड़ी रह गई। समस्‍तीपुर से दानापुर जाने में इस ट्रेन को 10 घंटे से अधिक का वक्‍त लगा। इससे भी किसी हाई-प्रोफाइल साजिश की आशंका को बल मिला।

बिहार से दिल्‍ली ट्रांसफर हुआ मुकदमा :

यह मुकदमा अनावश्‍क रूप से लंबा खिंचता चला गया। आगे सीबीआइ के आग्रह पर 22 मई 1980 को मुकदमा दिल्ली में सेशन ट्रायल के लिए भेज दिया गया। दिल्ली में भी यह मुकदमा पाटियाला हाउस कोर्ट से बाद में तीस हजारी कोर्ट में भेज दिया गया।

सीबीआइ ने आनंदमार्गियों के खिलाफ दायर किया आरोप पत्र
कोर्ट में सीबीआइ ने 10 आनंदमार्गियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया। सीबीआइ की थ्‍योरी के अनुसार आनंदमार्गियों ने अपने गुरू पीसी सरकार की जेल से रिहाई के लिए केंद्र पर दबाव बनाने के लिए रेल मंत्री की हत्या की थी।

बिहार सरकार की रिपोर्ट: घटना में आनंदमार्गियों की संलिप्‍तता नहीं
1977 में मुख्यमंत्री बनने के बाद कर्पूरी ठाकुर ने इस मामले में सीबीआइ जांच की दिशा पर सवाल उठाते हुए न्यायविद् एम तारकुंडे से कहा था कि वे सीबीआइ जांच दिशा की समीक्षा करें। इसके बाद तारकुंडे ने फरवरी, 1979 में अपनी रिपोर्ट में कहा था कि सीबीआइ इस मामले में आनंदमार्गियों को बेवजह फंसा रही है। रिपोर्ट को बिहार सरकार ने केंद्र सरकार के पास भेज दिया।

परिवार ने भी कहा: आनंदमार्गियों को बेवजह फंसा रही सरकार
बिहार पुलिस की सीआइडी ने भी इस हत्‍याकांड में बिहार व दिल्‍ली के दो बड़े राजनेताओं की साजिश की बात कही थी। ललित नारायाण मिश्र के भाई व पूर्व मुख्‍यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र तथा बेटे विजय कुमार मिश्र ने इस मामले में अपनी गवाही में आनंदमार्गियों से किसी दुश्मनी से इनकार किया था। इससे पहले ललित नारायण मिश्र की पत्‍नी कामेश्वरी देवी ने भी मई, 1977 में केंद्रीय गृह मंत्री चरण सिंह से अपने पति की हत्या के मामले की फिर से जांच की मांग उठा चुकीं थीं। उन्होंने भी कहा था कि इस कांड में गिरफ्तार आनंदमार्गी निर्दोष हैं।

एप्रूवर का बयान: सीबीआइ के दबाव में कही गलत बात
ललित नारायण मिश्र हत्‍याकांड की गुत्‍थी तब और उलझ गई, जब एप्रूवर विक्रम ने भी कहा कि सीबीआइ ने उसपर गलत बयान के लिए दबाव डाला था। उसके अनुसार सीबीआइ ने उससे गलत बातें कहवाईं।

बेटे ने फिर उठाई नए सिरे से जांच की मांग :

ऐसे में आश्‍चर्य नहीं कि इस कांड में हत्याकांड में 40 साल बाद उम्रकैद की सजा पाए चारों आरोपियों रंजन द्विवेदी, संतोषानंद अवधूत, सुदेवानंद अवधूत और गोपालजी काे ललित नारायण मिश्र के परिजन बेकसूर मानते हैं। अब उनके बेटे विजय कुमार मिश्र हत्‍याकांड की नए सिरे से जांच की मांग कर रहे हैं।

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