रोजी-रोटी की समस्या ना हो तो दोबारा नहीं जाना चाहते परदेस

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दरभंगा। लॉकडाउन के कारण दुश्वारियां झेल रहे प्रवासी अब दोबारा परदेस तो नहीं जाना चाहते। पर दो वक्त की रोजी-रोटी की व्यवस्था कैसी होगी, इसकी चिता उनके सामने बनी हुई है। लेकिन, अपनी जन्मभूमि पर लौटने के बाद यहीं अपनी दुनिया बसा लेना चाहते हैं। सीएम ने सूबे में ही रोजगार दिलाने की घोषणा के बाद इन हुनरमंदों के अरमानों को पर लग गए हैं। इसके लिए वह अपने हुनर को आधार बनाकर उस पर भविष्य की बुनियाद तैयार कर रहे हैं। जी हां, हम बात कर रहे हैं हायाघाट प्रखंड के अकराहा उत्तरी गांव की। जहां चहल-पहल लौटने लगी है। गांव की सड़कों के पास घर के बाहर पांच-छह लोग शारीरिक दूरी का पालन करते हुए आपस में बात कर रहे थे। गांव के कई मजदूरों ने बताया कि रोज मजदूरी करके परिवार का भरण-पोषण करते हैं। लेकिन, कोरोना के कारण सब कामकाज चौपट हो गई है। एक तरफ मौसम की मार झेलने को मजबूर है। हालांकि, लोग अपनी समस्याओं को दूर करने का भी प्रयास कर रहे हैं। धीरे-धीरे लोगों की जिदगी पटरी पर आने लगी है। कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए लगाए गए लॉकडाउन में गांव गुलजार होने लगे हैं। प्रवासियों को गांव फिर भाने लगी है। स्थिति ऐसी हो गई है कि घर-परिवार की चिता में मन अब दोबारा बाहर जाने की गवाही नहीं दे रहा है। इधर, होली में अपने घर आए सुबोध सहनी का कहना था कि हम बेरोजगार हो गए हैं। उन्होंने बताया कि वे केरल के कोच्चि में रिफाइनरी फैक्ट्री में टेकर मैन के रूप में कार्यरत था। वे होली में अपने घर आए थे। जब वे बाहर जाने की बात सोचे की इस बीच लॉकडाउन लग गया और फैक्ट्री भी बंद हो गई। वे पूरी तरह बेरोजगार हो गए। तब उन्होंने घर पर ही एक छोटी सी दुकान खोलकर उससे होने वाली आमदनी से अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं। वहीं, उक्त फैक्ट्री में ही वेल्डर के रूप में कार्यरत राजभुवन सहनी अपने घर पर ही दुकान खोलकर कमाई कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि दुकान पर पहुंचने वाले लोगों को शारीरिक दूरी का पालन करने की नसीहत भी देते हैं। गुजरात के जामनगर स्थित रिफाइनरी फैक्ट्री में काम कर रहे रामविलास सहनी, पश्चिम बंगाल में फैक्ट्री में क्रेशर का काम कर रहे दयानंद सहनी, दुखी सहनी, नरेश सहनी, नसीब सहनी ने बताया कि जीना यहां, मरना यहां, इसके सिवाय जाना कहीं नहीं है।

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