गांव में मिले रोजगार तो शहर जाने से हमेशा के लिए कर लेंगे तौबा

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दरभंगा । लॉकडाउन में नौकरी छूटने के बाद गांव पहुंच रहे मजदूरों एवं नौजवानों से गांवों की रौनक बढ गई है। चौक-चौराहों पर नौजवान अहले सुबह से जुटने लगते हैं और देश-दुनिया की खबरों पर चर्चा शुरू हो जाती है। बेनीपुर के बलनी गांव में शहर से वापस आए नौजवानों ने शुरू किया खेतों में पसीना बहाना। नौजवानों का कहना है कि कोरोना वायरस की स्थिति सबसे अधिक मुंबई, दिल्ली व गुजरात में खराब है। इसलिए अगले दो वर्षों तक इन प्रदेशों में जाने का नाम भी नहीं लेंगे। कहा कि अगर सरकार की ओर से गांव में रोजगार शुरू करने के लिए मदद मिल जाए तो युवा गांव में भी अच्छा रोजगार कर अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकते हैं। उन्हें रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में पलायन नहीं करना पड़ेगा। लॉकडाउन से पहले क्षेत्र के अधिकांश गांवों से रोजगार की तलाश में मजदूरों एवं युवाओं के पलायन से गांवों की चमक गायब हो गई थी। वहीं, लॉकडाउन में मजदूरों व युवाओं के वापसी से गांवों का पूरा माहौल ही बदल चुका है। परदेस से आए अधिकांश परदेसी बाबू अब अपने गांव की मिट्टी की खुश्बू के महत्व को समझने लगे हैं। गांव में जनजीवन पूरी तरह अब सामान्य होने लगा है। परदेसी बाबू अब अपने खेतों की देखभाल में जुट गए हैं। इसके साथ ही गांव के बुजुर्गों के साथ गांव के विकास की योजनाओं पर भी मंथन करने में युवा जुट गए हैं। गांव वापस आए युवाओं का कहना है कि गांवों में शिक्षा के अभाव के कारण अधिकांश किसान खेतों में ज्यादा उपज नहीं कर पाते हैं। वे लोग अब वैज्ञानिक विधि से खेती करेगें और अगर उसके बाद भी फसल की उपज अच्छी नहीं होगी तो बैंकों से ऋण लेकर व्यवसाय करेगें। दैनिक जागरण टीम गुरुवार को बलनी गांव पहुंची। गांव के कई नौजवान शारीरिक दूरी बनाकर अपने घरों में बच्चों को पढ़ा रहे थे। नौजवानों का कहना था कि वे बच्चों को कोराना वायरस से बचाव को लेकर फिजिकल डिस्टेंसिग और सफाई के संबध में भी बता रहे हैं। गांव के चौराहा पर ग्रामीण सुधीर कुमार झा मिले। कहते हैं कि शहर की जिदगी कम पैसे कमाने बालों के लिए अच्छी नहीं हैं। विश्वंभर झा ने कहा कि गांव के युवा पढ़-लिख कर रोजगार नहीं मिलने पर मजबूरी में ही शहर जाते हैं। रामनरेश झा ने कहा कि गांव की जिदगी से बढ़कर शहर की जिदगी नहीं होती। गांव के सुबध सहनी, पलटु मुखिया, रामनंदन साहु का कहना था की शहर की जिदगी बैचैन करती है। गांव में शांति महसूस होती है। अब गांव में ही मेहनत कर बच्चों का भरण-पोषण करेंगे।

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