जिस वक्त बहुसंख्यक मिथिलावासी सड़कों पर घिसट रहे थे, उस वक़्त हमारे युवा हवाई जहाज और आरोग्य सेतु में मैथिली को शामिल करने का आंदोलन कर रहे थे।

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माइग्रेटेड इलीट के हवा हवाई आंदोलन

माफ कीजियेगा, आज फिर थोड़ी कड़वी बात कहूंगा। मिथिला के नाम पर होने वाले ज्यादातर आंदोलन मुझे माइग्रेटेड इलीट के हवा हवाई आंदोलन लगते हैं। इसी वजह से मिथिला में रहने वाली गरीबों, वंचितों और बदहाल लोगों का स्वाभाविक जुड़ाव इन आंदोलनों से नहीं हो पाता।

आप गौर कीजिये, मिथिला के ज्यादातर आंदोलनों के विषय भाषा, संस्कृति, धरोहर, कभी कभार उद्योग के सवाल पर होते हैं। इनदिनों हवाई जहाज को लेकर दरभंगा और पूर्णिया में आंदोलन चल रहे हैं। मेरी निगाह में मिथिला के नाम पर चलने वाला कभी ऐसा कोई आंदोलन नजर नहीं आया जो इस क्षेत्र के करोड़ों भूख और बदहाली का सामना करने वाले लोगों के सवाल पर हुआ हो। उनकी रोजी, रोटी और मजदूरी के मसले पर हुआ हो। माफ कीजिये, उद्योग के नाम पर चलने वाले ज्यादातर आंदोलन भी गरीबों के लिये नहीं हैं। क्योंकि आज भी देश का सबसे वंचित तबका कारखानों से बाहर है। वह मजदूर है, मगर असंगठित क्षेत्र का।

वैसे तमाम उद्योग और कारखाने, जहाँ नियमित वेतन और दूसरी सुविधाएं उपलब्ध हैं, वहां मध्यम वर्ग के लोगों का ही कब्जा है।

यह सब इसलिये लिख रहा हूँ, उस वक़्त जब मिथिला के मजदूर सबसे अधिक परेशान हैं। सड़कों पर घिसटने वाले लोगों में सबसे अधिक दरभंगा, मधुबनी, सहरसा, कटिहार के लोग नजर आ रहे हैं। ये करोड़ों लोग अपने जीवन की सबसे बड़ी आपदा का सामना कर रहे हैं। मिथिला के नाम पर चल रहे एक भी संगठन ने इनके लिये आंदोलन नहीं किया। न कोई मजबूत आवाज उठाई। न किया तो न करते। मगर जिस वक्त बहुसंख्यक मिथिला वासी सड़कों पर घिसट रहे हैं उस वक़्त हमारे युवा हवाई जहाज और आरोग्य सेतु में मैथिली को शामिल करने का आंदोलन कर रहे थे। क्या यह अश्लीलता नहीं है?

ऐसे में यह क्यों नहीं माना जाए कि मिथिला के ज्यादातर आंदोलन इस समाज के छोटे से समृद्ध तबके के आंदोलन हैं। हमारे आंदोलनकारियों के लिये उन लोगों के सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, जिनकी गाड़ियां गांधी सेतु पर जाम में फंस जाया करती हैं। वे लोग नहीं, जिनका जीवन भारतीय राजमार्ग पर चिथड़े चिथड़े हो रहा है।

कल दुखी होकर दो पंक्तियों का एक पोस्ट लिखा तो कुछ साथी यह कहने लगे कि उद्योग लगने के लिये हवाई सेवा जरूरी है। उनकी जानकारी के लिये बता दूं कि मधेपुरा में कोई हवाई अड्डा नहीं है। मगर वहाँ रेल कारखाना है। झारखण्ड के गोड्डा और पाकुड़ में कोई हवाई अड्डा नहीं है। मगर वहां अडानी और कई बड़े कारोबारियों के उद्योग हैं। अगर जरूरत पड़ी तो वहां भी रातों रात हवाई अड्डे बन जाएंगे। दरभंगा और पूर्णिया के हवाई अड्डे उद्योग के लिये नहीं इन इलाकों के माइग्रेटेड इलीट के लिये जरूरी हैं। जिन्हें शादी ब्याह, पर्व त्योहार में घर आने में दिक्कत होती है। मिथिला में हवाई अड्डे चाहिये मगर पहले रोटी चाहिये।

भाषा और धरोहर के सवाल जरूरी हैं। मगर भूखे बदहाल लोगों के यह सवाल नहीं हैं।

अगर आप वाकई मिथिला के सवालों से जुड़ना चाहते हैं तो उन बहुसंख्यक लोगों के दुखों को समझें जो महज 5 से 7 हजार रुपये महीने की आमदनी के लिये अपने गांव और घर छोड़ने को विवश हैं। बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य जिनके लिये आज भी सपना है। जिनकी औरतें बच्चों को जन्म देते वक्त मर जाती हैं। जिनके बच्चे मामूली बुखार नहीं झेल पाते हैं। कुपोषण जिनके लिये कोई समस्या नहीं है। जिनके घरों तक टीकाकरण और परिवार नियोजन की रोशनी नहीं पहुंची है।

मगर दुर्भाग्यवश, ज्यादातर मैथिल संगठनों के दिमाग के खांचे से यह वर्ग बाहर है। उसे अपने गीत, नाद, व्यंजन, कला, चित्र और परंपराओं से बाहर झांकने की फुर्सत नहीं है। आपने अपने इलाके की 80 फीसदी आबादी को अपने विमर्श से बाहर कर दिया है और सम्पूर्ण मिथिला का आंदोलन चला रहे हैं।

अब आपके पास दो ही रास्ते हैं। या तो पुनर्विचार कीजिए। या ऐसा लिखने वालों की मजम्मत कीजिये। स्वागत है।

(वरिष्ठ पत्रकार पुष्यमित्र के फेसबुक वॉल से साभार,ये लेखक के निजी विचार हैं)

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