दरभंगा लोकसभा सीट का सियासी समीकरण, जानें जमीनी हकीकत…

दरभंगा । मिथिला की हृदयस्थली दरभंगा लोकसभा सीट बिहार में सबसे ज्यादा चर्चाओं में चल रही है और इसे लेकर तमाम कयास लगाए जा रहे हैं। एनडीए और महागठबंधन में ही इस सीट के कई दावेदार आमने-सामने हैं। दरभंगा से तीन बार के सांसद कीर्ति आजाद द्वारा कांग्रेस का दामन थाम लेने से यहां नए समीकरण उत्पन्न हो गये हैं। ऐसे में एनडीए और महागठबंधन किस तरह चुनावी शतरंज पर अपनी चाल बिछाएंगे यह यह खेल देखना बङा रोचक होगा।

दरभंगा के मौजूदा सांसद कीर्ति झा आजाद दरभंगा लोकसभा सीट से ही ताल ठोक रहे हैं, हालांकि बिहार कांग्रेस अध्यक्ष मदन मोहन झा ने स्पष्ट कर दिया है कि सीटों और उम्मीदवारों की घोषणा बाद में होगी। कांग्रेस पार्टी के विश्वस्त सूत्रों की मानें तो कीर्ति आजाद दरभंगा से टिकट मिलने के आश्वासन पर ही कांग्रेस में आए हैं। इससे माना जा रहा है कि पार्टी कीर्ति आजाद को दरभंगा से मैदान में उतार सकती है। हालांकि बिहार में कांग्रेस के महागठबंधन में शामिल होने और सीटों के बंटवारे को लेकर कोई अधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।

उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन ने सीटों के लिहाज से जिस प्रकार कांग्रेस को बेहद कम करके आंका है, अगर वही स्थिति बिहार में भी रही तो महागठबंधन में जाने को लेकर कांग्रेस पुनर्विचार भी कर सकती है। महागठबंधन के एक अन्य घटक दल VIP के अध्यक्ष मुकेश सहनी भी दरभंगा से ही चुनाव लड़ने पर पूरा जोड़ लगा चुके है। जबकि राजद नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री मो. अली अशरफ फातमी भी दरभंगा के पुराने क्षत्रप रहे हैं, पर बताया जा रहा है कि उन्हें मधुबनी सीट से मैदान में उतारने की तैयारी चल रही है।

एनडीए में भाजपा, जदयू और लोजपा की तिकड़ी मजबूत स्थिति में खड़ी है। एक टीवी चैनल पर आए सर्वे में भी इस गठबंधन को बढ़त दिखाई गई है। पर लगातार केसी त्यागी आरसीपी सिंह और नीतीश कुमार जी का 370 पर दिया बयान और लगातार सुप्रीम कोर्ट की फटकार और फिर आज 5 बच्चियों के शेल्टर होम मोकामा से गायब हो जाने की घटना से नीतीश कुमार और भाजपा के बीच गर्माहट बढ़ा चुकी है। अगर बिहार के राजनीतिक समीकरण समान ही रहे तो एनडीए को यहां फिर बढ़त मिलने के आसार ज्यादे दिखते हैं। एक तरह से देखा जाए तो राज्य में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सुंदर व साफ़ छवि और केन्द्र में नरेन्द्र मोदी सरकार का साथ इस गठबंधन को अच्छी माइलेज प्रदान कर रही है। NDA की ओर से सीटों की संख्या के बारे में तो अधिकारिक घोषणा हो चुकी है, लेकिन सीटें कौन सी होंगी इसको लेकर अभी तक संशय बरकरार है। लिहाजा दरभंगा में भाजपा और जदयू दोनों के ही दावेदार अपना दम दिखाने का प्रयास कर रहे हैं। जदयू की तरफ से संजय कुमार झा अपनी दावेदारी समय-समय पर पेश करते रहे हैं और हर छोटे-बड़े विकास का श्रेय भी लेने का प्रयास करते रहे हैं। संजय झा ने 2014 में भी दरभंगा से चुनाव लड़ा था और 12 प्रतिशत मत प्राप्त करते हुए तीसरे स्थान पर रहे थे।

उधर भाजपा की ओर से बिहार भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष गोपाल जी ठाकुर को भाजपा की तरफ से दावेदार माना जा रहा है। श्री ठाकुर का आरएसएस, विद्यार्थी परिषद से लगातार जुङे रहे हैं। भाजपा कार्यकर्ता के रूप में पंचायत अध्यक्ष से प्रदेश उपाध्यक्ष तक एक लंबा कार्यकाल रहा है और वे बेनीपुर के पूर्व विधायक भी रहे हैं। अपनी मेहनत व सामाजिक कार्यों से लोगों के बीच ये अपनी अलग पहचान रखते हैं। सोशल मीडिया पर गोपाल जी ठाकुर को उम्मीदवार बनाए जाने को लेकर जोर शोर से कैम्पेन भी चल रहा है,दरभंगा लोकसभा क्षेत्र में उनकी सक्रियता और हाल ही में कीर्ति आजाद के बयानों को पलटवार करने के यही मायने लगाए जा रहे हैं, कि भाजपा उन्हें अपना स्थानीय कार्यकर्ता ब्राम्हण उम्मीदवार मान कर चल रही।

कांग्रेस में शामिल हुए कीर्ति आजाद मैथिल ब्राह्मण कैटेगरी से आते हैं, जो दरभंगा का कोर वोट माना जाता है। लेकिन उनके खिलाफ 10 साल की जबरदस्त एन्टी इनकंबेंसी है। स्थानीय स्तर पर उनको विजिटिंग सांसद के तौर पर देखा जाता है, क्योंकि उनका अधिकांश समय दिल्ली में ही बीतता था। लेकिन महागठबंधन को मुस्लिम-यादव समीकरण और कुछ ब्राह्मण वोटों को आधार बनाकर कीर्ति को जिताने का प्रयास करेगा। कीर्ति आजाद दल बदलने को लेकर कांग्रस में अपनी घर वापसी बता रहे हैं, लेकिन उनके अपनी ससुराल दरभंगा में जनता उनकी वापसी कराएगी या नहीं, यह चुनाव परिणाम ही बताएंगे।

दूसरी तरफ यदि एनडीए की तरफ से जदयू नेता संजय झा को मैदान में उतारा जाता है, तो ब्राह्मण वोट बंटने के आसार बनते हैं। जबकि भाजपा कार्यकर्ता इस सीट पर जदयू के लिए कितने उत्साह से काम करेंगे कह पाना मुश्किल है। दरभंगा को परंपरागत तौर पर भाजपा की सीट माना जाता है, ऐसे में यदि यह सीट जदयू के खाते में जाती है तो भाजपा कार्यकर्ताओं का जोश ठंडा अवश्य पड़ेगा। इस स्थिति को भांपते हुए यदि राजग इस सीट को भाजपा के खाते में डालता है और भाजपा किसी ब्राह्मण उम्मीदवार को मैदान में उतारती है, तो वह महागठबंधन की ओर से कीर्ति आजाद से मुकाबले में बीस पड़ सकता है।

बहरहाल, चुनाव आते-आते कई समीकरण बनेंगे और बिगड़ेंगे। इस सीट से कौन मैदान में उतरेगा और कौन बाजी मारेगा यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि दरभंगा लोकसभा सीट पर उम्मीदवारों का निर्णय लेना दोनों की पक्षों के लिए चुनौतीपूर्ण होगा।

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