जहां सुबह में ‘पराती’ गाने की है परंपरा

News Of mithila डेस्क । विवाह के बाद परिवार की महिलाएं नई नवेली दुल्हन की ओर से भी पराती गाकर दूल्हे को जगाने का प्रयास करती हैं। बोल होता है भोरे भेलै हे पिया, भिनसरवा भेलै हे/उठू ने पलंगिया तेजि, कोयलिया बोलै हे।

मिथिला में पराती गाने की परंपरा अनोखी व सदियों पुरानी है। ग्रामीण परिवेश में यह परंपरा आज भी जीवित है। संगीत मिथिला के जन-सामान्य की जीवन-शैली का अभिन्न अंग है।

मिथिलावासियों का दाम्पत्य-जीवन अपने आप में एक मिसाल है और पूरी दुनिया के लिए अनुकरणीय भी। यहां पति-पत्नी एक-दूसरे के प्रति पूर्णत: समर्पित होते हैं। इसलिए यहां वैवाहिक संबंध विच्छेद या तलाक लेने जैसी कुप्रथा न के बराबर है। यहां तक कि मिथिला के लोग ‘तलाक’ शब्द को सुनना तक पसंद नहीं करते। यही कारण है कि मिथिलांचल में शादियां सत-प्रतिशत सफल देखी जाती हैं, जबकि पश्चिमी देशों में वैवाहिक संबंध-विच्छेद के आंकड़े काफी डराने वाले हैं।

मिथिला समाज में पति-पत्नी के रिश्तों को मजबूत बनाने के लिए सामान्य रूप से दैनिक जीवन में कई ऐसे रीति-रिवाज शामिल हैं, जिससे उनके दाम्पत्य-जीवन में प्रेम के डोर से जीवनभर के लिए बंध जाते हैं।

मिथिला में रिवाज है कि पत्नी अपने पति को खाना खिलाने के बाद ही खाना खाती है। इससे जिंदगी में एक-दूसरे के प्रति प्रेम बना रहता है। आइए, पड़ताल करते हैं कि सीता की माटी पर दाम्पत्य जीवन के मिठास के क्या कारण हैं।

मिथिला के लोग भगवान महादेव के उपासक होते हैं। यहां की विवाहिताएं नियमित रूप से गौरी-पूजन करती हैं। वे गौरी-पूजन अपने पति की सलामती के लिए या अन्य शब्दों में कहें तो चिर सुहागन बने रहने के लिए करती हैं। यहां पत्नी अपने पति को देवता मानती है और जीवनभर उसे पूजती है। बदले में वह पति से निश्छल प्रेम पाती है।

जानकी की जन्मभूमि की विवाहिताएं दोपहर होते ही काम पर गए अपने पति के लौटने का इंतजार करने लगती हैं और अपने घर के सारे काम-काज पूरा कर शाम होते ही सजने-संवरने लगती हैं, गाती या गुनगुनाती रहती हैं। लगता है, जैसे वह गीत गाकर अपने पति को बुला रही हों।

आधुनिक मिथिलांचल के लोग अक्सर जीविकोपार्जन के लिए काम की तलाश में अन्य प्रदेशों की ओर निकलते हैं। जब किसी स्त्री का पति गांव छोड़कर अन्य प्रदेश में काम करने के लिए जाता है, तो पत्नी अपने पति के वियोग में ‘लगनी’ गाते हुए दिन-रात काटती हैं।

लगनी का अर्थ है पति के प्रति लगन, प्रेम व अनुराग को दर्शाने के लिए पत्नी के मुंह से गाया-गुनगुनया जाने वाला गीत। यह आंचलिक भाषा का शब्द है। चलिए, सुनते हैं एक लगनी की दो पंक्तियां और विरहिणी स्त्री के दुख का अनुमान लगाते हैं :

पिया परदेश गेलै, सभ सुख लय गेलै।

रोपि गेलै अमुआं के गाछ रे की।

फरिय-पकिय अमुआं, अधरस चुबि गेलै।

कोना हम रखबै जोगाय रे की।

मिथिला में बेटी की शादी को ‘कन्यादान’ कहते हैं। इसका अर्थ होता है वरपक्ष को कन्या दान कर देना। इसे वैवाहिक महायज्ञ भी कहते हैं। कन्यादान में भाग लेने वाले हर व्यक्ति को पुण्य का भागी माना जाता है। दो भिन्न परिवारों के बीच अभिन्न रिश्ते बनाने के लिए यह एक सामाजिक अनुष्ठान होता है। इस अनुष्ठान में परिवार के सदस्य व समाज के हर व्यक्ति की जिम्मेदारी तय की जाती है। इस तरह कई सारे सामाजिक सुसंगठित रीतियां बनाई गई हैं, जिस पर कोई प्रश्न नहीं उठा सकता। यही कारण है कि यहां वैवाहिक जीवन शत प्रतिशत सफल होता है।

सृष्टि के निर्माण में स्त्री-पुरुष के संबंध का कोई विकल्प नहीं है। मनुष्य रूपी सृष्टि की कल्पना दाम्पत्य जीवन से ही है और इस वैवाहिक जीवन की अनोखी बानगी देखनी हो तो चलिए मिथिला और रूबरू होइए यहां की अविश्वसनीय सांस्कृतिक विरासत से।

(लेखक डॉ. बीरबल झा, ब्रिटिश लिंग्वा के प्रबंध निदेशक एवं मिथिलालोक फाउंडेशन के चेयरमैन हैं)

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